Wednesday, June 29

इंसुलिन इलाज से जुड़े 3 डर और उन्हें दूर करने के उपाय, जानिए

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टाइप 2 डायबीटीज के इलाज के लिए कई तरह की दवाएं उपलब्ध हैं लेकिन टाइप 1 डायबीटीज वाले लोगों के लिए इंसुलिन ही इलाज का प्रमुख तरीका है। पिछले 2 दशकों के दौरान दवा कंपनियां शरीर में इंसुलिन उत्पादन को प्रेरित करने, शरीर को ग्लूकोज का बेहतर उपयोग करने में सहायता करने या शरीर द्वारा ग्लूकोज के अवशोषण यानी रिटेन्शन को कम करने में मदद के लिए कई दवाएं लेकर आई हैं। इन सबके बावजूद इंजेक्टेबल इंसुलिन डायबीटीज को रोकने की सबसे प्रभावी दवाओं में से एक है, जिसमें डायबीटीज की दूसरी दवाओं के मुकाबले ब्लड शुगर को कम करने की सबसे बेहतर क्षमता होती है।

मरीजों के मन में इंसुलिन के बारे में गलत धारणाएं-

1922 में इंसुलिन की खोज के बाद से लगभग एक सदी बीत चुकी है लेकिन भारत में अब भी कई मरीजों के मन में इंसुलिन के बारे में गलत धारणाएं हैं और वे इंसुलिन यूज करने का विरोध करते हैं। नतीजतन वे अक्सर इंसुलिन से होने वाला इलाज शुरू करने में संकोच करते हैं। वे ऐसी दवाएं लेते हैं जिनसे सही ग्लाइसेमिक कंट्रोल नहीं मिलता और उन्हें नाड़ियों से जुड़ी जटिलताओं का खतरा पैदा हो जाता है। इस कारण उनकी रक्त प्रणाली पर भी प्रभाव पड़ता है और शरीर के कई अन्य अंगों के लिए जोखिम बढ़ जाता है। इस समस्या का समाधान करने की जरूरत है लेकिन इससे पहले भारत में प्रचलित आशंकाओं और इंसुलिन के उपयोग से जुड़ी चिंताओं को समझना जरूरी है। यहां हम आपको बात रहे हैं इंसुलिन से जुड़े 3 सबसे बड़े डर और उनके समाधान के बारे में….



पहला और सबसे बड़ा डर: बड़ी सुइयों का डर-

अधिकांश मरीजों के लिए सुइयों का डर इंसुलिन थेरपी का विरोध करने या डॉक्टरों की सलाह के हिसाब से नियमित रूप से इंसुलिन का उपयोग न करने के प्रमुख कारणों में से एक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि सुइयों को देखकर लोगों को उनके बचपन के दिनों की याद आ जाती है जब टीके लगाने के लिए बड़ी दर्दनाक सुइयों का इस्तेमाल किया जाता था। आधुनिक इंसुलिन उपकरणों में बहुत महीन सुइयां होती हैं जो उन्हें मरीज़ों के अधिक अनुकूल बनाती हैं और इंजेक्शन की प्रक्रिया कम दर्दनाक होती है। कई मरीज़ इस बात को स्वीकार करते हैं कि इनसे इंसुलिन उपचार लगभग दर्द रहित हो जाता है। अब भारतीय बाजार में इंसुलिन देने के लिए कम दर्द वाले तरीके और बिना सुई के ग्लूकोज की जांच करने वाले उपकरण मौजूद हैं इसलिए मरीज़ों को इन विकल्पों के बारे में अपने डॉक्टर से पता कर लेना चाहिए।